झारखंड की अनूठी पारंपरिक वास्तुकला रांची में मिट्टी और पत्थरों से बना १०० साल पुराना तीन मंजिला कोठा घर आज भी है सुरक्षित
झारखंड की राजधानी रांची के पास स्थित एक ग्रामीण क्षेत्र में मिट्टी, लकड़ी और पत्थरों की मदद से निर्मित एक अत्यंत दुर्लभ और ऐतिहासिक ३ मंजिला पारंपरिक मकान आज भी अपनी मजबूती के साथ सीना ताने खड़ा है, जिसे स्थानीय भाषा में ‘कोठा घर’ के नाम से जाना जाता है। न्यूज़१८ की इस विशेष खोजी फोटो-रिपोर्ट के अनुसार, इस भव्य और कलात्मक घर का निर्माण लगभग १०० वर्ष पहले किया गया था। इस घर की सबसे बड़ी स्थापत्य विशेषता यह है कि इसे बनाने में आधुनिक निर्माण सामग्री जैसे सीमेंट, कंक्रीट, छड़ या लोहे का बिल्कुल भी उपयोग नहीं किया गया है। इसके बजाय, कुशल ग्रामीण कारीगरों ने स्थानीय स्तर पर उपलब्ध चिकनी मिट्टी, प्राकृतिक पत्थरों, बांस और मजबूत सखुआ व साल की लकड़ियों के पारंपरिक ढांचे का उपयोग करके इसे बेहद खूबसूरती से तैयार किया है। यह घर न केवल झारखंड की समृद्ध जनजातीय और लोक वास्तुकला का एक जीवित दस्तावेज है, बल्कि पर्यावरण-अनुकूल और टिकाऊ निर्माण तकनीकों का भी एक बेहतरीन उदाहरण प्रस्तुत करता है।
इस १०० साल पुराने ऐतिहासिक कोठा घर की आंतरिक बनावट और डिजाइन आज के आधुनिक इंजीनियरों को भी हैरत में डाल देती है। मिट्टी की मोटी-मोटी दीवारें इस घर के भीतर के तापमान को प्राकृतिक रूप से नियंत्रित रखती हैं, जिसके कारण यह घर भीषण गर्मियों के महीनों में बेहद ठंडा और सर्दियों के दिनों में अंदर से काफी गर्म व आरामदायक बना रहता है। इस तीन मंजिला इमारत में ऊपर जाने के लिए लकड़ी की पारंपरिक सीढ़ियां बनाई गई हैं और इसकी छतों व फर्श को मजबूत बनाने के लिए लकड़ियों के लट्ठों और मिट्टी के विशेष लेप का इस्तेमाल किया गया है। पीढ़ी-दर-पीढ़ी इस घर में रहने वाले स्थानीय परिवार ने इसकी ऐतिहासिक विरासत और मूल स्वरूप को पूरी तरह से सहेज कर रखा है। वर्तमान में यह अनोखा मिट्टी का महल दूर-दूर से आने वाले पर्यटकों, शोधकर्ताओं और वास्तुकला के छात्रों के लिए आकर्षण का एक बड़ा केंद्र बन चुका है, जो यह साबित करता है कि प्रकृति के सहयोग से बनाई गई पारंपरिक भारतीय संरचनाएं सदियों तक बिना किसी नुकसान के सुरक्षित रह सकती हैं।

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