झारखंड में पलाश के घटते जंगल संकट में पर्यावरण और आदिवासियों की आजीविका, एशिया का सबसे बड़ा कुंदरी लाह बागान बदहाली का शिकार
झारखंड के पलामू जिले में स्थित एशिया के सबसे बड़े प्राकृतिक पलाश वन ‘कुंदरी लाह फार्म’ के संकटग्रस्त होने से स्थानीय आदिवासी और दलित समुदायों की आजीविका पर गहरा असर पड़ा है। १ मई २०२६ को जारी इस पर्यावरण और ग्रामीण अर्थव्यवस्था रिपोर्ट के अनुसार, ४२१ एकड़ में फैला यह ऐतिहासिक प्राकृतिक जंगल लगभग ६२,००० पलाश के पेड़ों का घर है, जो पारंपरिक रूप से लाह उत्पादन का एक बहुत बड़ा केंद्र रहा है। झारखंड पूरे देश का आधे से अधिक यानी सालाना लगभग १०,००० मीट्रिक टन लाह का उत्पादन करता है, जिससे राज्य के ४ लाख से अधिक ग्रामीण और जनजातीय परिवारों को उनकी कुल कृषि आय का २५ से ३० प्रतिशत हिस्सा प्राप्त होता है। एक पलाश का पेड़ एक सीजन में ५ से ७ किलोग्राम लाह का उत्पादन करता है, जो बाजार में ५०० रुपये प्रति किलोग्राम की दर से आसानी से बिक जाता है। इस प्राकृतिक राल का उपयोग सरकारी सील लगाने, औषधीय कैप्सूल की कोटिंग, चूड़ियों के निर्माण, फलों की चमक बढ़ाने, प्रिंटिंग स्याही और नेल पॉलिश उद्योग में बड़े पैमाने पर किया जाता है, जिसके चलते भारत सालाना लगभग १३३ मिलियन डॉलर मूल्य के लाह और रेजिन का निर्यात अमेरिका, बांग्लादेश और जर्मनी जैसे देशों को करता है।
इस समृद्ध उद्योग के बावजूद, जमीनी स्तर पर काम करने वाली गरीब महिलाएं और ग्रामीण किसान प्रशासनिक कुप्रबंधन, संस्थागत उपेक्षा और मजदूरी के विवाद के कारण हाशिए पर चले गए हैं। वर्ष २०१५ से २०१८ के बीच स्थानीय सहकारी समितियों और ग्रामीणों ने दिन-रात पहरा देकर इस जंगल को अवैध कटाई से बचाया था, लेकिन वर्ष २०१८ में बड़े पैमाने पर हुए उत्पादन के बाद वन विभाग और ग्रामीण सहकारी समितियों के बीच वित्तीय भुगतान को लेकर हुए आपसी विवाद के चलते सैकड़ों महिलाओं की कई महीनों की मेहनत की मजदूरी अटक गई। इसके बाद वर्ष २०२० के देशव्यापी लॉकडाउन ने इस पूरी उद्योग श्रृंखला को नष्ट कर दिया, जिसके कारण कुंदरी फार्म बंद हो गया और सुरक्षा के अभाव में पेड़ों की अवैध कटाई और चोरी बढ़ गई। पलाश का पेड़ न केवल आर्थिक रूप से महत्वपूर्ण है, बल्कि पारिस्थितिक रूप से भी बेहद अनूठा है; यह फरवरी-मार्च के सूखे महीनों में जब पूरा जंगल पत्तीविहीन हो जाता है, तब सैकड़ों पक्षियों और कीटों के लिए अमृत का मुख्य स्रोत बनकर ‘फूड ब्रिज’ का काम करता है और मिट्टी में नाइट्रोजन का स्थिरीकरण कर भूमि की उर्वरता बढ़ाता है। वर्तमान में झारखंड सरकार ने लाह की खेती को कृषि का दर्जा देकर और १,०७४ परिवारों को जोड़कर २१,००० पलाश के पेड़ों की छंटाई के जरिए इसे पुनर्जीवित करने का प्रयास शुरू किया है, लेकिन पुरानी लंबित मजदूरी और हाल ही में हुई ६ लाख रुपये मूल्य के लाह की चोरी जैसी सुरक्षा चुनौतियों के कारण ग्रामीण अभी भी संशय में हैं।

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