झारखंड के ग्रामीण कामगारों में नए रैम जी कानून को लेकर अविश्वास मनरेगा बंद होने से रोजगार और मजदूरी पर गहराया संकट
केंद्र सरकार द्वारा दिसंबर २०२५ में पारित किए गए नए कानून ‘विकसित भारत गारंटी फॉर रोजगार एंड आजीविका मिशन (ग्रामीण)’ यानी ‘वीबी-जी रैम जी’ को लेकर झारखंड के ग्रामीण इलाकों और श्रमिक संगठनों में गहरी चिंता और अविश्वास का माहौल है। रांची से जारी इस विस्तृत जमीनी रिपोर्ट के अनुसार, यह नया कानून वर्ष २००६ से चले आ रहे ऐतिहासिक राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम यानी मनरेगा की जगह लेने जा रहा है, जिसे आगामी १ जुलाई से पूरी तरह लागू कर दिया जाएगा। हालांकि ग्रामीण विकास मंत्रालय ने आश्वासन दिया है कि पुराने कार्य निर्बाध रूप से नए ढांचे में स्थानांतरित कर दिए जाएंगे, लेकिन सामाजिक कार्यकर्ताओं और लिबटेक इंडिया जैसी संस्थाओं के आंकड़े इस दावे के विपरीत गंभीर रोजगार संकट की ओर इशारा कर रहे हैं। उदाहरण के लिए, चालू वित्तीय वर्ष के पहले महीने यानी अप्रैल में झारखंड में मनरेगा के तहत सृजित मानव-दिवसों में पिछले वर्ष की तुलना में ९२.८ प्रतिशत की भारी गिरावट दर्ज की गई है, जो पिछले साल के लगभग १.४ करोड़ मानव-दिवस से घटकर इस साल महज १० लाख के आस-पास रह गई है। कामगारों को डर है कि नया कानून ग्रामीण भारत में रोजगार आवंटन और बजटीय आवंटन को पूरी तरह सीमित कर देगा, जिससे उनके अस्तित्व पर संकट खड़ा हो जाएगा।
ग्रामीण कामगारों और सामाजिक कार्यकर्ताओं की इस गंभीर चिंता की एक बड़ी वजह नए कानून का नीतिगत ढांचा भी है। मनरेगा के तहत जहाँ काम पाना श्रमिकों का कानूनी अधिकार था, वहीं नए ‘रैम जी’ कानून में काम का आवंटन काफी हद तक प्रशासनिक विवेक और केंद्र सरकार की अधिसूचनाओं पर निर्भर करेगा। इसके अलावा, राज्य के विभिन्न गांवों जैसे मुरकुनी और बिशाखटांगा के ग्रामीणों का कहना है कि कृषि सीजन से पहले जनवरी से मई के महीनों में मिलने वाली मनरेगा की मजदूरी ही उनकी ‘लाइफलाइन’ होती थी, जिसके बंद होने या सीमित होने से अब बड़े पैमाने पर मौसमी पलायन बढ़ रहा है। ग्रामीण कामगार विशेष रूप से महिलाएं वर्तमान में झारखंड की दैनिक मनरेगा मजदूरी दर २५४ रुपये को बहुत कम मानती हैं और लंबे समय से बकाया मजदूरी न मिलने, तकनीकी उपस्थिति दर्ज करने में आने वाली दिक्कतों और निचले स्तर पर फैले भ्रष्टाचार से पहले ही बेहद परेशान हैं। ऐसे में श्रमिकों और ‘मनरेगा वॉच’ जैसे संगठनों का स्पष्ट मानना है कि जब तक सरकार जमीनी स्तर के भ्रष्टाचार और भुगतान की विसंगतियों को दूर नहीं करती, तब तक बिना किसी व्यापक जन-परामर्श के थोपा गया यह नया कार्यक्रम भी पूरी तरह विफल रहेगा और गरीब मजदूरों को राहत देने में नाकाम साबित होगा।

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