फर्जी डिक्री दिखाकर आदिवासी जमीन पर नहीं जमा सकते कब्जा, झारखंड हाईकोर्ट का अहम आदेश
आदिवासी जमीन को लेकर झारखंड हाईकोर्ट ने अहम टिप्पणी करते हुए स्पष्ट किया है कि फर्जी समझौता डिक्री के सहारे जमीन पर कब्जा बरकरार नहीं रखा जा सकता। अदालत ने कहा कि अगर जमीन का हस्तांतरण धोखाधड़ी या मिलीभगत से हुआ है और वह सीएनटी एक्ट के प्रावधानों के खिलाफ है, तो ऐसा हस्तांतरण कानूनी तौर पर मान्य नहीं होगा।
यह फैसला न्यायमूर्ति संजय कुमार द्विवेदी की एकल पीठ ने धालभूम के मौजा देवघर की आदिवासी जमीन से जुड़े मामले में सुनाया। मामला राजस्व थाना संख्या 1147 की जमीन से संबंधित था। याचिकाकर्ताओं ने दावा किया था कि 1967 में दायर टाइटल सूट में हुए समझौते के बाद से वे जमीन पर काबिज हैं। उन्होंने यह भी दलील दी कि इतने लंबे समय के बाद सीएनटी एक्ट की धारा 71(ए) के तहत जमीन वापसी की कार्रवाई शुरू नहीं की जा सकती।
हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ताओं की दलील पर असहमति जताई। अदालत ने रिकॉर्ड का हवाला देते हुए कहा कि कथित समझौता 1968 में हुआ था, लेकिन दाखिल-खारिज के लिए आवेदन काफी बाद में 1999 में दिया गया और इसकी रसीदें 2000 के बाद कटीं। अदालत के मुताबिक, यह स्थिति इस बात की ओर इशारा करती है कि संबंधित जमीन का हस्तांतरण शुरुआत से ही वैध नहीं था।
अदालत ने यह भी साफ किया कि धोखाधड़ी से हासिल की गई जमीन पर लंबे समय तक कब्जा रहने से उस कब्जे को वैधता नहीं मिल जाती। यदि जमीन पर कब्जा किसी फर्जीवाड़े या मिलीभगत के जरिए हासिल किया गया है, तो सिर्फ वर्षों से वहां रहने के आधार पर कानूनी अधिकार का दावा नहीं किया जा सकता।
मामले में जमीन पर मकान बनाए जाने का तर्क भी दिया गया था। याचिकाकर्ताओं का कहना था कि निर्माण के बाद जमीन छप्परबंदी भूमि में बदल गई है। हाईकोर्ट ने इस दलील को खारिज करते हुए कहा कि जमीन मूल रूप से छप्परबंदी नहीं थी। केवल फर्जी समझौते के आधार पर मकान बना देने से सीएनटी एक्ट के प्रतिबंधों से बचने का रास्ता नहीं खुलता। अदालत ने धारा 46(3) का उल्लेख करते हुए कहा कि ऐसे लेनदेन को किसी दीवानी, आपराधिक या राजस्व अदालत के आदेश से वैध नहीं ठहराया जा सकता।
हाईकोर्ट ने दिवंगत ज्योतिष सिंह मुंडा की पत्नी को प्रथम कानूनी वारिस के तौर पर जमीन वापसी की कार्रवाई शुरू करने का अधिकार भी माना। अदालत ने धालभूम के एलआरडीसी, पूर्वी सिंहभूम के उपायुक्त और पुनरीक्षण प्राधिकरण द्वारा आदिवासी परिवार के पक्ष में दिए गए आदेशों को सही ठहराया और रिट याचिका खारिज कर दी। इस फैसले में अदालत ने सीएनटी एक्ट के तहत संरक्षित आदिवासी जमीन पर अवैध कब्जे के खिलाफ सख्त रुख स्पष्ट किया है।

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