सर्वोच्च न्यायालय की फटकार के बावजूद झारखंड सरकार ने सारंडा साल जंगलों को वन्यजीव अभयारण्य घोषित करने में की देरी
सर्वोच्च न्यायालय (सुप्रीम कोर्ट) द्वारा बार-बार दी गई सख्त चेतावनियों और राज्य के दो वरिष्ठ अधिकारियों के व्यक्तिगत आश्वासन के बावजूद, झारखंड सरकार ने एशिया के सबसे बड़े और महत्वपूर्ण ‘साल’ (सखुआ) जंगलों में से एक, सारंडा वन क्षेत्र को वन्यजीव अभयारण्य (वाइल्डलाइफ सेंचुरी) घोषित करने के आदेश पर पुनर्विचार याचिका (रिव्यू पीटिशन) दायर कर दी है। जैव विविधता का प्रमुख केंद्र होने के कारण यह पूरा क्षेत्र हाथियों के झुंडों और कई लुप्तप्राय प्रजातियों का प्राकृतिक आवास है। इस वन क्षेत्र में लगातार होने वाले वनों की कटाई और बड़े पैमाने पर लौह अयस्क खनन गतिविधियों के कारण हाथियों के गलियारे (कोरिडोर) प्रभावित हुए हैं, जिसके चलते वन्यजीवों को पड़ोसी राज्यों की ओर पलायन करने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है।
अदालत ने पूर्व में राज्य सरकार को तेरह नवंबर, दो हजार पच्चीस से तीन महीने का समय देते हुए लगभग तीन सौ चौदह वर्ग किलोमीटर (इकतीस हजार चार सौ अड़सठ हेक्टेयर) के इस वन क्षेत्र को वन्यजीव अभयारण्य के रूप में अधिसूचित करने का अंतिम निर्देश दिया था। हालांकि, राज्य सरकार ने इस समय सीमा को पार करते हुए दो महीने की देरी से चौदह फरवरी को एक पुनर्विचार याचिका दायर की, जिस पर कोर्ट की रजिस्ट्री ने भी आपत्ति जताई है। झारखंड सरकार का तर्क है कि अभयारण्य घोषित होने से वहां सदियों से रह रहे आदिवासी समुदायों के पारंपरिक अधिकार और बुनियादी ढाँचे प्रभावित होंगे। इसके विपरीत, शीर्ष अदालत ने राज्य के इस दावे को काल्पनिक बताते हुए स्पष्ट किया कि पर्यावरण और वन्यजीवों का संरक्षण करना राज्य की प्राथमिक जिम्मेदारी है, जिसे विकास और खनन के दबाव में टाला नहीं जा सकता।

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