विकसित भारत’ के दृष्टिकोण में बुजुर्गों की अनदेखी; लंबी उम्र को अधिकार बनाने की जरूरत
भारत की जीवन प्रत्याशा ७२ वर्ष को पार कर गई है और अनुमान है कि २०५० तक हर पांच में से एक भारतीय ६० वर्ष से अधिक आयु का होगा। हालांकि, “विकसित भारत २०४७” के सरकारी विजन में हाई-स्पीड ट्रेनों और युवा कार्यबल पर तो जोर है, लेकिन तेजी से बढ़ती बुजुर्ग आबादी एक ‘फुटनोट’ की तरह नजर आती है। वर्तमान में भारतीयों की स्वस्थ जीवन प्रत्याशा उनकी कुल आयु से लगभग १० साल कम है, जिसका अर्थ है कि जीवन के अंतिम वर्ष अक्सर बीमारी या विकलांगता में बीतते हैं। यदि नीतिगत बदलाव नहीं किए गए, तो भविष्य का भारत एक स्टार्टअप हब के बजाय भीड़भाड़ वाले सरकारी अस्पतालों जैसा दिखेगा।
लेख के अनुसार, भारत को स्वस्थ दीर्घायु को प्राथमिकता देनी चाहिए और इसे केवल अमीरों का विशेषाधिकार नहीं बनने देना चाहिए। इसके लिए सरकार को प्राथमिक स्वास्थ्य देखभाल, जेरियाट्रिक (वृद्धों की) देखभाल और पेंशन सुधारों में निवेश करने की आवश्यकता है। वर्तमान में बुजुर्गों की देखभाल का बोझ मुख्य रूप से महिलाओं द्वारा अवैतनिक श्रम के रूप में उठाया जाता है, जिसे सार्वजनिक सेवाओं और प्रशिक्षित देखभाल करने वालों के माध्यम से साझा किया जाना चाहिए। यदि भारत अपने बुजुर्गों को केवल ‘जीवित’ रखने के बजाय ‘सक्षम’ बनाए रखने पर ध्यान केंद्रित करे, तो यह आबादी देश के लिए एक आर्थिक संपत्ति बन सकती है।

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