मुफ्त टीकाकरण और एकल खुराक के नियम से स्वदेशी एचपीवी वैक्सीन की मांग में आई कमी
भारत में निर्मित सर्वाइकल कैंसर वैक्सीन (एचपीवी) को वर्तमान में चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है क्योंकि वैश्विक स्तर पर ‘एकल खुराक’ (सिंगल-डोज) के बढ़ते समर्थन और अंतरराष्ट्रीय संगठनों से मिलने वाले मुफ्त टीकों ने इसकी मांग को धीमा कर दिया है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों और नीति निर्माताओं के बीच इस बात पर चर्चा तेज हो गई है कि क्या स्वदेशी वैक्सीन को सरकारी टीकाकरण कार्यक्रमों में प्राथमिकता मिल पाएगी। वर्तमान में, वैश्विक स्वास्थ्य निकायों द्वारा सुझाई गई एकल खुराक की रणनीति उन देशों के लिए अधिक किफायती साबित हो रही है जो बड़े पैमाने पर टीकाकरण अभियान चला रहे हैं, जिससे बहु-खुराक वाली स्वदेशी वैक्सीन की स्थिति प्रभावित हुई है।
इस बदलाव के कारण भारत निर्मित एचपीवी वैक्सीन को बाजार में अपनी जगह बनाने के लिए कड़ी प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ रहा है। जहाँ एक ओर सरकार सर्वाइकल कैंसर को रोकने के लिए व्यापक टीकाकरण का लक्ष्य रख रही है, वहीं दूसरी ओर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उपलब्ध मुफ्त टीकों के विकल्प इसे कतार में पीछे धकेल रहे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि स्वदेशी टीकों को सरकारी खरीद और वितरण प्रणाली में उचित प्रोत्साहन नहीं मिला, तो स्थानीय उत्पादन और नवाचार की गति पर इसका असर पड़ सकता है। आने वाले समय में स्वास्थ्य मंत्रालय के फैसले यह तय करेंगे कि देश के टीकाकरण बेड़े में इस ‘मेड इन इंडिया’ वैक्सीन की क्या भूमिका होगी।

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